जनसेवा के लिए छोड़ी लाखों की अमेरिकन नौकरी, अब IPS बन बदल रहे भारत में गांवों की तस्वीर

पुलिस अपने कठोर रवैये, दण्डारत्मिक कारवाई, कड़क स्वभाव और कठोर हृदय के लिए जाने जाते हैं। कभी कभी इनकी असभ्य भाषा लोगों के लिए परेशानी का कारण बनती है। पुलिस हमारी सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहती है परंतु कुछ वजहों से लोग उन्हें नकारात्मक दृष्टिकोण से देखते हैं। मगर कुछ पुलिस वाले इस अवधारणा को तोड़ते हुए एक सहोगात्मक सकारात्मक और सामाजिक विकास में सतत सहयोग कर एक अलग ही छवि और चरित्र का निर्माण करते हैं। आई.पी.एस. अधिकारी पूर्णिया, बिहार जिले के एस.पी. निशाँत कुमार तिवारी उन्हीं चेहरों में से एक हैं।

एस.पी. साहब गाँव-गाँव जा कर शिक्षा का अलख जगा रहेे हैं। अभिभावकों से अपने बच्चों को शिक्षित करने की शपथ दिलाई जा रही है। पुर्णिया पुलिस “मेरी पठशाला” अभियान को ले कर खासी लोकप्रिय हो रही है। कप्तान साहब की इस पहल में वह स्वयं और सभी पुलिस वाले अपने काम से फूर्सत के समय दूर दराज के गाँवो में जा कर अशिक्षित बच्चों और व्यस्कों के बीच पाठशाला लगाते हैं और अपना समय देकर सबों को पढ़ाई के प्रति प्रेरित करते हैं।

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वर्ष 2005 बैच के आई.पी.एस अधिकारी एस.पी. निशाँत का तबादला पिछले 11 वर्षो में 7 जगहों पर हो चुका है। और जहाँ पर भी वह गये उन्होनें एक पुलिस अधिकारी से बढ़कर एक सामाजिक कार्यकर्ता के रुप में कार्य किया है। हर जिले में अपनी तैनाती के दौरान उन्होनें गरीबों, युवाओं और अशिक्षितों के लिए बहुत से कार्य किए हैं। कहीं गरीब बुजुर्गों में मुफ्त चश्मा वितरण किया तो कहीं युवाओं के लिए खेलकूद का आयोजन करवाया। इतना ही नहीं गरीबों के बीच कंबल भी बँटवाए। शिक्षा के क्षेत्र में भी इन्होनें महत्वपूर्ण सहभागिता निभाई पर कोई नाम नहीं दिया।

Nishant-Tiwary

साल 2016 में राजधानी पटना से 350 कि.मी. दूर एक बाढ़ ग्रस्त इलाके पूर्णिया में इनका तबादला हुआ जहाँ कि साक्षरता दर देश में सबसे कम है तो उन्होनें शिक्षा के प्रति जागरुकता लाने के लिए “मेरी पाठशाला” का पहल किया। गौरतलब है कि पुर्णिया में हर साल 6-7 महीने विस्थापित मजदूर वर्ग मखाना उद्योग और जूट उद्योग में दूर दराज इलाके से काम करने आते हैं। ऐसे में माता-पिता के साथ आने वाले बच्चों की पढ़ाई भी छूट जाती है।

साॅफ्टवेयर इंजीनियर रहे निशाँत तिवारी ने चार सालों तक अमेरिका में काम किया। अमेरिका की चकाचौंध और अपने प्रदेश में फैली अशिक्षा और गरीबी को करीब से देखने के बाद उन्होंने अमेरिका छोड़ स्वदेश लौटने का निश्चय किया और शिक्षा के प्रति जागरुकता में लग गये। पूर्णिया के श्रीनगर और चम्पारण ओपी के चनका गाँव से यह पाठशाला शुरु की गई।



आदिवासी और दलित बाहुल्य क्षेत्र में चलने वाली “मेरी पाठशाला” अभी 5 गाँवों हरदा, बिलौरी, बाइसी, चंका और श्रीनगर में चल रही है। 1 घण्टे चलने वाली यह पाठशाला हर रविवार को लगती है। इस पाठशाला में ब्लैक बोर्ड, फ्लिटर वाटर और किताब काॅपी की व्यवस्था रहती है। छात्रों के बीच समय-समय पर पठन पाठन, खेल सामग्री आदि का भी वितरण किया जाता है। एस.पी. तिवारी के साथ-साथ पूर्णिया पुलिस महकमा और आसपास के शिक्षित युवा और बुजुर्ग भी इस काम में जुड़ गये हैं और हर संभव मदद करते हैं। आॅस्ट्रेलिया के ला ट्रोब युनिवर्सिटी के हिन्दी प्रोफेसर इयान वुलफर्ड जो फणीश्वर नाथ रेणु पर रिसर्च कर रहे हैं, वह भी पुलिस अधीक्षक की इस मुहिम से प्रभावित हो इससे जुड़ गयें हैं और ट्विटर के माध्यम से “मेरी पाठशाला” के बारे में ट्विट करते हैं।

अबतक 1 हजार से अधिक बच्चों का दाखिला आसपास के सरकारी विद्यालयों में “मेरी पाठशाला” के द्वारा करवाया गया है। निशाँत यह मानते हैं कि दिल से लोंगों को शिक्षित करने का काम किया जाए तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे देश में हर कोई साक्षर होगा। निशाँत की इस कोशिश से पुलिस में लोगों का विश्वास बढ़ा है और पुलिस की छवि में भी काफी सुधार हुआ है।

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एक सफल व्यक्ति सब को सफल देखना चाहता है। एस.पी. निशाँत तिवारी ने उच्च शिक्षा और अमेरिका जैसे विकसित देश में नौकरी करके और प्रशासनिक अधिकारी बनकर भी अपने देश और देशवासी के उत्थान के लिए जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं ताकी साक्षरता दर बढ़े और लोगों का जीवन स्तर बेहतर हो। यदि देश के शिक्षित वर्ग ऐसे ही सामाजिक जिम्मेदारी उठाने के लिए संकल्प ले तो वह दिन दूर नहीं जब भारत एक सफल विकसित राष्ट्र की श्रेणी में होगा।

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