किसान के बेटे ने तकनीक से लाखों लोगों तक पहुंचाई मुफ्त शिक्षा, अब बना रहे गांव को डिजिटल

शिक्षा सशक्त राष्ट्र के निर्माण की सीढ़ी है शिक्षा के अभाव में विकसित और सुदृढ़ समाज की कल्पना बेमानी लगती हैं। आज भले ही हमारा देश सफलता के नित नए आयामों को छु रहा है पर आज भी लाखों-करोड़ों बच्चे ऎसे हैं जो सुविधाओं के आभाव में पढ़-लिख नहीं पाते हैं। उन बच्चों का भी सपना होता है कि वे भी अपने स्तर से विकसित भारत के निर्माण में अपना योगदान दे। उन्हीं अभावग्रस्त बच्चों में से हैं रावपुरा जयपुर के शंकर यादव जिन्होंने अपनी मजबूरी के आगे घुटने नहीं टेके बल्कि अपने दम पर अपनी मज़बूरी को अपनी हिम्मत बनाया और लाखों करोड़ो अभ्यर्थियों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गए।

राहे तो लाख बुलाती है मुसाफिर को, मंजिल तक जो ले जाए वही राह दिखता हूँ साहिर को।

शंकर यादव ने दूसरों के लिए देखा शिक्षा का सपना और उन्हें समाधान नजर आया डिजिटल एप्लीकेशन में, आज की तारीख में यह 21 वर्षीय युवा 40 से ज्यादा ऑफ़लाइन एजुकेशनल ऐप बना चुके हैं। जो देश और विदेश के विद्यार्थी की शिक्षा सम्बन्धी समस्याओं का नियमित रूप से समाधान कर रहे हैं।

वो कहते है ना “जाके पाँव ना फ़टी बिवाई वह क्या जाने पीर पराई” शंकर ने भी अपनी पढ़ाई के लिए अभावग्रस्त हालातों से संघर्ष किया। वो जानते हैं कि एक छोटे से गाँव में रहकर संपूर्ण विश्व की जानकारी हासिल करना बहुत मुश्किल काम है ऊपर से किताबों की खरीद पर भी बहुत व्यय होता है। एक किसान के बेटे शंकर के लिए एक समय ऐसा भी आया कि उनके पास अपने सिलेबस के अलावा अन्य सामान्य ज्ञान की किताबें खरीदने के पैसे ही नहीं थे। वे किसी तरह से बस अपनी पढ़ाई को जारी रखे हुए थे।

किताबों के अभाव से बाधित होती शिक्षा की परिस्थितियों में मैंने एक सपना देखा कि मैं कुछ ऐसा करूँगा जिससे मेरे जैसे लाखों बच्चों को किताबें खरीदने की जरूरत ही ना रहे और उनकी शिक्षा निर्बाध रूप से चलती रहे।

साल 2009 में शंकर जब 8वीं कक्षा में थे तब गांव के ही सरकारी स्कूल के शिक्षक शिवचरण मीणा ने उन्हें प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने हेतु प्रश्नों के उत्तर ऑनलाइन खोजने की सलाह दी। तब शंकर ने जाना की ऑनलाइन भी पढ़ाई की जा सकती है। और यह पहला अवसर था जब उनका सपना हकीकत का रूप लेने के पथ पर बढ़ा, उन्हें लगा कि किताबों को भी डिजिटल स्वरूप में एक्सेस किया जा सकता है। इसके बाद शंकर की रुचि कंप्यूटर में बढ़ने लगी। कंप्यूटर सिखने की अभिलाषा और लग्न को देखते हुए शंकर के पिता कल्लूराम यादव ने अपनी कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद अपने बेटे के लिए कंप्यूटर खरीदा।



उसके बाद शंकर पढ़ाई के साथ-साथ कंप्यूटर भी सिखने लगे। इसी दौरान उन्होंने गूगल पर एप्लीकेशन बनाने की तकनीक के बारे में जानकरी हासिल करना शुरू किया। समय बीतता गया शंकर ने रावपुरा स्थित सरकारी स्कूल से साल 2011 में 10वीं बोर्ड की परीक्षा पास की और फिर गांव के ही एक प्राइवेट स्कूल से गणित विषय से 12वीं की परीक्षा पास की। इसी दौरान ऐप बनाने को लेकर शंकर की दिलचस्पी इस कदर बढ़ने लगी कि वे प्रोग्रामिंग सीखने की ऑनलाइन क्लासेज के बारे में सर्च करने लगे और उन्होंने बेंगलुरु से एंड्रॉयड डेवलपमेंट कोर्स की ट्रेनिंग लेनी प्रारम्भ कर दी।

परिस्थियां चाहे कितनी ही विपरीत क्यों ना हो अगर आपके मन में अपने सपने को पूरा करने का जोश और जूनून हो तो आपको रास्ते अपने आप मिलने लगते हैं। मुझे भी रास्ता मिला और मैं उस पर बढ़ने लगा।

एंड्रॉयड डेवलपमेंट का कोर्स करते हुए शंकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किये गये डिजिटल इंडिया मुहिम से खासा प्रेरित हुए और इसी मुहिम से प्रेरणा लेते हुए वे बदलाव की राह पर आगे बढ़ने लगे। शंकर चाहते तो किसी भी बड़े शहर से एप्लीकेशन निर्माण का कार्य कर सकते है या किसी अच्छी कंपनी में काम करने की बजाय उन्होंने एप्लीकेशन निर्माण के कार्य को शुरू करने के लिए अपने गाँव रावपुरा को अपनी कार्यस्थली बनाया। शंकर अपने गांव के पहले एप्लीकेशन डेवलपर है।

शंकर ने अपने गांव की हर छोटी-बड़ी जानकारी से लैस डिजिटल रावपुरा नाम से एक एप का भी निर्माण किया है जिसमें गांव की सभी जानकारियाँ शामिल हैं। शंकर की इस पहल के लिए श्री राजकुमार यादव (IAS) जिला कलेक्टर साऊथ सिक्किम व श्री राजकुमार देवायुष सिंह (राजस्थान भाजपा सह संयोजक खेल प्रकोष्ठ) द्वारा उन्हें सम्मानित भी किया गया है। शंकर आज के युवाओं को संदेश देते हुए कहते है की ” जब आप अपने गाँव या छोटे शहर में रहकर विश्व से जुड़ सकते है तो पलायन क्यों करे। हम अपने गाँव का विकास किये बगैर भारत के विकास की कल्पना कैसे कर सकते है।

शंकर ने अपने गाँव में रहकर ही एक के बाद एक एजुकेशनल ऐप का निर्माण किया। एजुकेशनल ऐप के अलावा शंकर ने धर्म, स्वास्थ्य, खेल आदि से संबंधित ऐप्स भी बनाये। अपनी विश्वसनीयता बनाये रखना शंकर के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्य है क्योंकि वे नहीं चाहते की किसी भी प्रकार की गलत जानकारी विद्यार्थियों को प्राप्त हो। ऐसे में एप्स के कंटेंट जेनरेशन में खासा ध्यान देते है। शिक्षकों और मित्रों की सहायता से एप अपडेट करते है, निरंतर नई जानकारी जुटाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। टीम में शंकर समेत 4 अन्य लोग शामिल हैं जो ऐप्स को अपडेट रखने में उनका सहयोग कर रहे हैं। शंकर ने गाँवो में इंटरनेट और नेटवर्क की अनुपलब्धता को देखते हुए इस तरह के ऐप्स बनायें हैं जिनका उपयोग ऑफलाइन भी किया जा सकता है जिससे किसी भी प्रकार की असुविधा ना हो।



उन्होंने सभी एजुकेशन एप्स को 10वीं और 12वीं के बच्चों व प्रतियोगी परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों को ध्यान में रखकर विज्ञान, गणित, भूगोल व सोशल साइंस के अलावा भारतीय संविधान, राजस्थान की संस्कृत, सामान्य ज्ञान से जुड़े एप्स का निर्माण किया है। आज शंकर के बनाये एप्स को 50 हजार से ज्यादा लोग इंस्टॉल कर चुके हैं। और साथ ही हर दिन उनके एप्स को लगभग 1.5 करोड़ व्यूज मिलते हैं। शंकर के एप्स एक क्रांति है शिक्षा के क्षेत्र में जिससे देश का बच्चा-बच्चा आसानी से शिक्षित हो सकता है। सारे ऐप्स गूगल प्ले स्टोर पर मुफ़्त उपलब्ध हैं। जिन्हें आसानी से डाउनलोड किया जा सकता है। आठ महीने पहले ही इन एप्स को गूगल प्ले स्टोर पर डाला गया था। खास बात है कि अब तक इन ऐप्स को 20 लाख से ज्यादा लोग डाउनलोड कर चुके हैं।

शंकर यादव जैसे प्रतिभा संपन्न लोग अपनी लगन से देश में क्रांति लाना चाहते हैं भारत के प्रत्येक वर्ग को शिक्षित करना चाहते हैं। इस उत्साही युवा ने 40+ ऐप बनाकर देश के छात्रों को मुफ्त में समर्पित किया है जिससे की एक सशक्त और शिक्षित भारत का निर्माण हो सके। शंकर ने केनफ़ोलिओज़ से ख़ास बातचीत में बताया कि ” हमारा विचार आने वाले दिनों में शिक्षा, स्वास्थ्य आदि से सम्बंधित कई एप्लीकेशन निर्माण करना हैं और यह सभी कार्य हम अपने गाँव में रहकर ही पूर्ण करेंगे और पलायन करने वालो की सोच को बदलेंगे। हमारे कार्य में यदि कुछ दरकार है तो सरकार के सहयोग की। सरकार के सहयोग से हम सम्पूर्ण देश में शिक्षा की क्रांति लाना चाहते है।



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